धोबी-धोबिन क बतकही..(क्रियात्मक गीत)

गँवई तलइया में बस्तर धोवै जात की बेरियाँ धोबी-धोबिनी आपन हियरे क मरम एक दुसरे से बतियाव तारन ! लुगाई गरीबी क रोवना रोव तिया तऽ मनसेधू ओकरा के गवें-गवें ढाढस दे तारन, समझावत-बुझावत बाड़न । इहै आपसी पति-पत्नी संवाद चल रहल बा -

धोबिन- रहि-रहि जियरा कचोटै ला हे पियऊ हम दाना-दाना के मोहाल ।
सऊँसै जहनवाँ में सजना बताय देता, हमरो से बड़ के कँगाल ?

धोबी- जिय दुख जनि माना धनि बउरहिया, बिरथा करैलू अफसोस ।
उहै मोर तिरिया निपट भिखमँगवा जेकरे हिय न संतोष ॥

धोबिन- के मोर पिया हो अकसवो से ऊपर भुईंया से के गरुआय ?
जियते जियत के मुअल माटिलौना तनि देता बलमू बताय ?

धोबी- बाबू रे बहुरिया अकसवो से ऊपर भुईंया से गरुइल माय ।
जियते जियत उन्हैं मूअल तू बूझिहा, कमवाँ से जे कदराय ॥

धोबिन- अमिरित-अमिरित सुनीला सजनवाँ, अमिरित कहवाँ भेंटाय ?
सरग नरक कहाँ कवन डगरिया तहवाँ सजन लेइ जाय ?

धोबी- तृषना कै नाश सरग मोरि सजनी अमिरित नेहिया सोहाय ।
घोर नरक इहै देहियाँ  रे तिरिया नारी नरक लेइ जाय ॥

धोबिन- के बड़ अन्हरा कवन बड़ गुँगवा के दुशमनवाँ क खान ?
मुअलो से बड़ का बतावा ए करेजऊ, का जग मरन समान ?

धोबी- कामी अन्ध, गुँगवा समय अनबोलता, मन दुशमनवाँ क खान ।
मुअलो से बड़ अपजस मोरि रनियाँ माँगन मरन समान ॥

धोबिन- दीरघ रोग कवन जग रजऊ कवन अगिनियाँ अपार ?
कवन गहनवाँ पहिरि झमकवलै हरियर होखै ला सिंगार ?

धोबी- दीरघ रोग ई दुनियैं बहुरिया चिन्ता अगिनियाँ अपार ।
शील गहनवाँ पहिरि अँग ’पंकिल’ जिनगी कै निखरै सिंगार ।

Comments

  1. ’केतना खाया ,केतना पचाया एकौ समझ में न आए ”
    आपकी पोस्ट में पहेलीनुमा संवाद की माध्यम से क्या जीवन-दर्शन प्रस्तुत हुआ है।
    ’निबवा क पेड़वा गजब नीक लागे ,जब निबकौरी न होए ’

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  2. फिर आता हूँ 'बतकहीं' पर !
    आज बड़ी रात हो गयी है !

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  3. हिमांशु भाई ,
    भोजपुरी में इतने सुन्दर सुभाषित बता दिए हैं आपके पिता जी ने
    कि क्या कहूं !
    क्या खूब होता कि स्त्री-पुरुष के सामूहिक स्वर में इस संवाद की
    'पोडकास्टिंग' हो जाती ! लगता कि संवाद सुन रहा हूँ ! लोक की
    चीजों का सघन एन्द्रिक आस्वाद ही सुकून देता है !
    मुझे अगर इश्वर एक सर और देना चाहेगा तो एक गायक का सर
    मांगूंगा !
    कुछ सुभाषित तो गजब हैं भाई ---
    ...........
    @ कामी अन्ध, गुँगवा समय अनबोलता, मन दुशमनवाँ क खान ।
    मुअलो से बड़ अपजस मोरि रनियाँ माँगन मरन समान ॥
    ------------ याद आया - '' मांगन ते मरनो भलो , यह सतगुरु की सीख '' !
    ...............
    @ दीरघ रोग ई दुनियैं बहुरिया चिन्ता अगिनियाँ अपार ।
    शील गहनवाँ पहिरि अँग ’पंकिल’ जिनगी कै निखरै सिंगार ।
    ---------- '' चिता दहति निर्जीव तन , चिंता जीव समेत '' !
    ............
    आभार !

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  4. accha prayaas mujhe ab tak nahi pata tha ki dhobi ghat par samasya purti va prashn uttar ki shaili me itni achchi philospy mil jaati hai
    bhojpuri me jatsaar ke maadhyam se bhi lok sahitya ki ek vidha hai jisme hamara atit swatantra sangram ki kahaniya rekhit hui hai kabhi use bhi prakashit kijiyega english vartani me likhane ke liye kshama

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  5. इसे सस्वर सूना जाये...! चाह पूरी हो जाय मेरी..!

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आप सब के बोलावल-दुलरावल आ कुछ कहल एह सलोन भोजपुरिया के मन के हुलास देहल करी। आप आईं, बतियाईँ आ समझाईं। बाउर लिखवइया के लिखाई के सजावे खातिर आप सब के नीक-नेउर प्रोत्साहन बहुते जरूरी बा। हम राह देखब। पहिलहीं आभार।

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